Thursday, 13 September 2012

हकीक़त


गज़ल

जिसे हम कहते हैं दुनिया वो इक दुनिया ख्याली है
बड़ी दिलकश है उपर से मगर अन्दर से ख़ाली है

हकीक़त  पर न  कादिर हो ख्यालों पर तो कादिर है
हर इक इन्सान की बस इसलिए दुनिया निराली है

भला ऐसी नमाज़ों से जनाबे शेख़ क्या हासिल
सलामत दाग है दिल का जबीं सजदों से काली है

है दावा बंदगी का पर तलब है हूरो-गुल्मां की
ये कैसी बंदगी है जो अभी तक दिल सवाली है

वही हसरत करें उक्बा मैं तेरी दीद की या रब!
जिन्हें लगता है यह दुनिया तेरे जलवों से खाली है

ज़्यादा हो गया मुश्किल किताबे हुस्न को पढ़ना
ये जब से अक्ल मंदों ने लुग़त अपनी निकाली है

झुका कर पाए जानां पर जबीने शौक को मैंने
हबीब अपनी हकीक़त की हकीक़त आप पाली है



غزل 

جسے ہم کہتے ہیں دنیا وہ اک دنیا خیالی ہے
 بڑی دل کش ہے اپر سے مگر اندر سے خالی ہے

حقیقت پر نہ قادر ہوخیالوں پرتو قادر ہے
ہر اک انسان کی بس اس لئے دنیا نرالی ہے

بھلا ایسی نمازوں سے جناب شیخ کیا حاصل
سلامت داغ ہے دل کا جبیں سجدوں سے کالی ہے

ہے داعوہ بنذگی کا اورطلب ہے حور و غلماں کی 
یہ کیسی بندگی ہے جو ابھی تک دل سوالی ہے

وہی حسرت کریں عقبہ میں تیری دید کی یا رب
جنہیں لگتا ہے یہ دنیا ترے جلوں سے خالی ہے

زیادہ ہوگیا مشکل کتاب حسن کو پڑھنا
یہ جب سے عقل مندوں نے لغت اپنی نکالی ہے

جھکاکر پائے جاناں پر جبین شوق کو میں نے
 حبیب اپنی حقیقت کی حقیقت آپ پالی ہے

शब्दों के अर्थ:
ख्याली,  (विचार)
दिलकश,  (दिल को खीचने वाली) 
हकीक़त,  (वास्तव) 
कादिर,  (सक्षम) 
जबीं,  (माथा)
हूरो-गुल्मां,  (स्वर्ग की अप्सराएँ)
उक्बा,  (स्वर्ग) 
लुग़त,  (शब्दकोश)
पाए जानां,  (यार के पैर ) 

हबीब कविशी 


Monday, 10 September 2012

ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती (रह.) की ग़ज़ल


 Ghazal In Persion (Farsi) And Translation in Urdu and Hindi 

(1) Persion
 توئی کہ جز توُ ترا خود حجاب دیگر نیست
بغیر نور رخت را نقاب دیگر نیست
(1) Urdu
تو ہے کہ تیرے سوا دوسرا حجاب نہیں
سوائے نور کے تیرے کوئی نقاب نہیں
(1) Hindi
तू है कि तेरे सिवा दूसरा कोई हिजाब नहीं है 
सिवाय नूर के तेरे कोई तेरा नक़ाब नहीं है 
(2) Persion
توئی معّرفِ خود لا جرم بدہی گشت
کہ در تصور تو اکتساب دیگر نیست
(2) Urdu
فقط توہی ہے کہ واقف ہے ذات سے اپنی
تیرے خیال میں غیروں کا اکتساب نہیں
 (2) Hindi 
फ़कत तू ही है वाकिफ़ ज़ात से अपनी
तेरे ख्याल  में गैरों का इक्तसाब नहीं है
(3) Persion
رموز عشق ز لوح دلم مطالعہ کن
کہ حلِّ نکنۂ عشق از کتاب دیگر نیست
(3) Urdu
رموز عشق کو پڑھ دل کی لوح پر اپنی
کہ اس کے نکتہ کے حل کی کوئی کتاب نہیں
 (3) Hindi
रमूज़-ए-इश्क को पढ़ दिल की लोह पर अपनी
कि इसके नुक्ते के हल की कोई किताब नहीं है 
(4) Persion
شہود حق طلبی از وجود خود بگذر
کہ زجز وجود تو او را حجاب دیگر نیست
(4) Urdu
گذر وجود سے اپنے جو ہو خدا طلبی
سوا وجود کے تیرے کوئی حجاب نہیں
(4) Hindi
गुज़र वजूद से अपने, जो हो खुदा तालिब 
सिवा वजूद के तेरे, कोई हिजाब नहीं
(5) Persion
ز قصر تن بگذر ،در لباب جاں بنگر
درا ں لباب عجب گر کتاب دیگر نیست
(5) Urdu
گذر کے جلد بدن سے تو مغز جان کو دیکھ
کہ لوح جاں کے علاوہ کوئی کتاب نہیں


(5) Hindi
गुज़र के जल्द बदन कर तू महज़ जान को देख 
के तेरी जान के अलावा कोई किताब नहीं
(6) Persion
بمرد زاہد ما، در خمار خمر بہشت
گماں کہ برد جزآں مے شراب دیگر نیست
(6) Urdu
خمار بادۂ جنت میں مر گیا زاہد
گماں اُسے تھا کہ اس کے سوا شراب نہیں


(6) Hindi
खुमार-ए-बादाह-ए-जन्नत में मर गया जाहिद
गुमाँ उसे था के उसके सिवा शराब नहीं है
(7) Persion
چو محو تست معیں نام او چہ می پرسی
کہ جز خموشی اش اکنوں جواب دیگر نیست
(7) Urdu
جب اس میں محو ہے تو اے معین نام نہ پوچھ
سوا سکوت کے اِس دم کوئی جواب نہیں 
(7) Hindi
जब उसमें खो गया तो ऐ मोईन नाम न पूछ
सिवा सकूत के इस दम कोई जवाब नहीं


शब्दों का अर्थ:
हिजाब =पर्दा
फ़कत = बस
वाकिफ़ = परिचित
इक्तसाब = ज़िक्र
रमूज़ = रहस्य
वजूद = बदन, शख्सियत
खुमार-ए-बादाह-ए-जन्नत = जन्नत की शराब का सुरुर
जाहिद = शेख
सकूत = ख़ामोशी


Translated By Habib Kavishi 

Thursday, 6 September 2012

धर्म क्या है?


धर्म क्या है?

धर्म पर क्या कहूं? जो कहा जा सकता है वह धर्म नहीं होगा। जो कल्पना से परे है, वह बोलने की शक्ति में नहीं हो सकता है। किताबों में जो है वह धर्म नहीं है, केवल शब्द ही हैं। वहाँ शब्द पक्ष की ओर ले जाने के भले ही संकेत हैं, पर वह  हक  नहीं हैं। शब्दों से पंथ बनते हैं, धर्म तो बहुत दूर रह जाता है। इन शब्दों ने मनुष्य को बाँट दिया है, मानव के बीच पत्थरों की दीवारें नहीं शब्दों की दीवारें हैं। मनुष्य और हक  के बीच भी शब्दों की ही दीवार है। वास्तव में जो हक से दूर किए हुए है, वही उसे सब से दूर किए हुए है। शब्दों का एक मजबूत घेरा है, हम सब उस  के बीच फस गए हैं, वह घेरा हमसे लिपटा हुआ है। शब्द ही हमारी बेहोशी हैं और शब्दों की सुंदर तस्बीह ( जाप ) में हम अपने आप से बहुत दूर निकल गए हैं। खुद से जो दूर है और खुदी से जो अनजान है वह हक  के पास और हक  को जानने वाला नहीं हो सकता। यह इसलिए कि खुद का जाना हुआ सत्य ही करीब का हक  है, बाकी सब दूर है,  बस खुद से खुदी दूर नहीं है। शब्द स्वयं को जानने नहीं देते, शब्दों का कोहराम इस ख़ामोशी को नहीं जानने नहीं देता जो मैं हूँ। शब्दों का धुआं उस आग को सामने आने नहीं देता जो कि हक  है और हम अपने कपड़ों को जानते-जानते मिट जाते हैं पर उससे नहीं मिल पाते जिसके कपड़े थे और जो कपड़े पहने हुए था। मैं जब भी अपने अंदर देखता हूँ, वहाँ शब्द ही शब्द नजर आते हैं।


 अल्लाह, रसूल, स्वर्ग,   नर्ग  आदि शब्द ही हैं। चाहे वह भावना हो, विचार हो, ज़िक्र हो, यह भी शब्द ही हैं। मैं  शब्दों के तह दर तह क़ैद खानों में बंद हूँ। क्या मैं इन गुमानों पर जो मैंने खुद बनाए हैं पर समाप्त हो जाऊँगा? या मैं उनसे अलग भी कुछ जानता हूँ, जिसे मैं अपना जाना हुआ कह सकता, अपना अनुभव कह सकता। इस सवाल पर सब कुछ टिका है और इस सवाल का जवाब भी अगर शब्दों से आया तो हक तक कभी नहीं पहुंचा जा सकता। क्योंकि मुझे लगता है मेरा ख्याल मेरे ख्याल की हद है। उसके पार क्या  है, उस की  तो  हवा भी नहीं लग सकती। और आमतौर पर लोग अपने गुमान और विचार से लौट आते हैं। यह दीवार गायब है जो दिखती नहीं है, इन्हें यहीं  से वापस कर देती है। जैसे कोई कुऑं खोदने जाए और कंकड़ और पत्थर को पाकर निराश होकर रुक जाए। वैसा ही अपनी खुदाई में होता है, यही वजह है कि नबी ने कहा कि निराशा कुफ़्र है। और यह होता है हम जब अपने भीतर जाते हैं तो शब्दों के कंकड़ और पत्थर ही हमें मिलते हैं और आत्मा तक पहुँच नहीं हो  पाती। आत्मा  तक पहुँचने के लिए  सारी परतें निकाल देनी पड़ती हैं और यह जरूरी भी है। शब्दों को जब तक खोदते रहना है, जब तक वह जो शब्दों में नहीं आ सकता (यानी शब्द उस को कवर नहीं कर सकते जो सब कवर किये हुए है), जब तक वह खामोश आईना नहीं मिल जाए (यानी भीतर का सुकून). यह खुदाई बहुत मुश्किल है, इसमें कीना, ईर्ष्या, जलन, क्रोध (यानी नफस-ए-अम्मारा) की  सभी सूरतो से सामना होता है। जो इससे पार पाता है, जो बाकी रहता है, वह भीतर का सुकून  (यानि नफस-ए-मुतमाइन्ना) पाता है।  यहीं से धर्म शुरू होता है, इसी को सिरातल-मुस्तकीम (यानि सीधा रास्ता) कहते हैं, यही मेरा जाना हुआ  हक  है।.

धर्म निर्धारित नहीं है, वह तो वह है जो सबको  चुनता है। एक-एक  विचार को एक-एक गुमान को दूर करते जाना है, चाहे अच्छा हो या बुरा हो। हक और कुछ नहीं, जहाँ विचार और भावना न रहें, रह जाए तो चेतना, केवल चेतना रह जाए। .

यह तो कल्पना का पालन करते हैं और वास्तव में कल्पना हक  की जगह नहीं ले सकती। 
(कुरआन, आयत संख्या 27)

 
जिस ने पहचाना अपने नफ्स को उसने पहचाना अपने रब को।
(हदीस रसूल करीम)

مذہب کیا ہے؟

مذہب پر کیا کہوں؟ جو کہا جا سکتا ہے وہ مذہب نہیں ہوگا، جو گمان سے پرے ہے ،وہ بولنے کی قوت میں نہیں ہو سکتا ہے، کتابوں میں جو ہے وہ مذہب نہیں ہے صرف الفاظ ہی ہیں وہاں الفاظ حق کی طرف لے جانے کے بھلے ہی اشارے ہوں ،پر وہ حق نہیں ہیں، لفظوں سے مسلک بنتے ہیں ،دین تو بہت دور رہ جاتا ہے ،ان لفظوں نے انسان کو باٹ دیا ہے، انسانوں کے بیچ پتھروں کی دیواریں نہیں لفظوں کی دیواریں ہیں،انسان اور حق کے درمیاں بھی لفظوں کی ہی دیوارہے،اصل میں جو حق سے دور کئے ہوئے ہے،وہی اسے سب سے دور کئے ہوئے ہے،لفظوں کا ایک مضبوط گھیرا ہے، ہم سب اس کے درمیاں پھس گئے ہیں،وہ گھیرا ہم سے لپٹا ہوا ہے الفاظ ہی ہماری بیہوشی ہیں،اور لفظوں کی خوبصورت تسبیح میں ہم اپنے آپ سے بہت دور نکل گئے ہیں، خود سے جو دور ہے اور خود سے جو انجان ہے وہ حق کے قریب اور حق کو جاننے والا نہیں ہو سکتا یہ اس لئے کہ خود کا جانا ہوا حق ہی قریب کا حق ہے،باقی سب دورہے بس خود سے خودی دور نہیں ہے ،الفاظ خود کو جاننے نہیں دیتے لفظوں کا کوہرام اس خاموشی کو نہیں جاننے نہیں دیتا جو کہ میں ہوں ، لفظوں کا دھواں اس آگ کو سامنے نہیں آنے دیتا جو حق ہے،اور ہم اپنے کپڑوں کو جانتے جانتے مٹ جاتے ہیں اس سے نہیں مل پاتے جس کے کپڑے تھے اور جو کپڑے پہنے ہوئے تھا ،میں جب بھی اپنے اندر دیکھتا ہوں،وہاں الفاظ ہی الفاظ نظر آ تے ہیں۔

اﷲ،رسول، جنت ،دوزح وغیرہ الفاظ ہی ہیں،چاہے وہ گمان ہو،خیال ہو، ذکرہو یہ بھی الفاظ ہی ہیں، اور میں لفظوں کے تہہ در تہہ قیدخانوں میں بند ہوں، کیا میں ان گمانوں پر جو میں نے خود بنائے ہیں پر ہی ختم ہو جاؤں گا ؟یا کہ میں ان سے الگ بھی کچھ جانتا ہوں ،جسے میں اپنا جانا کہہ سکوں اپنا مشاہدہ کہہ سکوں،اس سوال پر ہی سب کچھ ٹکا ہے؟اور اس سوال کا جواب بھی لفظوں سے آیا تو حق تک کبھی نہیں پہنچا جاسکتا،کیوں کہ میرا خیال ہی میرے خیال کی حد ہے ،اس کے پار کیا ہے اس کی تو ہوا بھی نہیں لگ سکتی ،اور عام طور پر لوگ اپنے گمان اور خیال سے ہی واپس لوٹ آتے ہیں،یہ دیوار غائب ہے جو دکھتی نہیں ہے،انہیںیہیں سے ہی واپس کر دیتی ہے،جیسے کوئی کنواں کھودنے جائے اور کنکڑ اور پتھر کو پا کر مایوس ہوکر رُک جائے ، ویسا ہی اپنی کھدائی میں بھی ہوتا ہے ،یہ ہی وجہ ہے کہ نبی نے فرمایا کہ مایوسی کفر ہے،اور یہ ہوتا ہی ہے ہم جب اپنے اندر جاتے ہیں تو لفظوں کے کنکڑ اور پتھر ہی ہمیں ملتے ہیں،روح تک رسائی نہیں ہو پاتی روح کی رسائی کے لئے یہ ساری پرتیں نکال دینی پڑتی ہیں،اور یہ ضروری بھی ہے،لفظوں کو جب تک کھودتے رہنا ہے، جب تک کے وہ جو لفظوں میں نہیں آسکتا یعنی الفاظ اس کا احاطہ نہیں کر سکتے جس نے سب کا احاطہ کر رکھا ہے، جب تک وہ خاموش آئینہ نہ مل جائے (یعنی ذات حق)یہ کھدائی بہت مشکل ہے،اس میں کینہ،بغض ،حسد،جلن ،غصّہ یعنی نفس امّارہ کی تمام صفاتوں سے سامنا ہوتا ہے، جو اس سے پار پاتا ہے ،وہ جو باقی رہتا ہے وہ نفس مطمئنہ پر فائض ہوتا ہے یہیں سے دین شروع ہوتا ہے،اسی کو صراط المستقیم کہتے ہیں یہی میرا جانا ہوا حق ہے۔


مذہب منتحب نہیں ہے وہ تو وہ ہے جو سب کو انتخاب کرتا ہے، ایک ایک خیال کو ایک ایک گمان کودور کرتے جانا ہے چاہے اچھّا ہو یا برا حق اور کچھ نہیں جہاں خیال اور گمان نہ رہیں،رہ جائے تو شعور صرف شعور رہ جائے۔

اِنْ یَتَّبِعُوْنَ اِلاَّ الظَّنَّ واِنَّ الظَّّنَّ لَاےُغْنِیْ مِنَ الْحَقِّّ شَیْئاًْ 
(یعنی یہ تو اپنے گمان کی پیروی کرتے ہیں اور بیشک گمان حق کی جگہ نہیں پہونچ سکتا)
(قرآن آیت نمبر ۲۷ سورۃ نجم)

مَنْ عَرَفَ نَفْسَہُ فَقَدْ عَرَفَ رَبَّہُ
(یعنی جس نے پہچانا اپنے نفس کو اس نے پہچانا اپنے رب کو) 
(حدیث رسول کریم)



(By sayyad tufail ahmad (raja kavishi

Tuesday, 4 September 2012

नज़्म: कैदी की फरयाद



कोई पंछी खुले आकाश में जब गीत गाता है
ज़माना अपनी आज़ादी का हमको याद आता है

कभी बाहर के मन चाहे नज़ारे देखते थे हम 
कभी लहरों को दरया के किनारे देखते थे हम
कभी बागों में खिलते फूल सारे देखते थे हम
कभी अपनी छतों से चाँद तारे देखते थे हम

ये पंछी आज हम को याद वो यादे दिलाता है
ज़माना अपनी आज़ादी का हमको याद आता है

कभी हम ईद के दिन सब गले मिलते-मिलाते थे
कभी दीपावली के दिन दिए घर में जलाते थे 
कभी पच्चीस दिसंबर को क्रिसमस डे मानते थे 
कभी प्रकाश उत्सव पर गुरुद्वारे सजाते थे 

हर इक बीता हुआ त्यौहार जब सपनों में आता है 
ज़माना अपनी आज़ादी का हमको याद आता है

हमें अब याद आता है वो हँसता खेलता बचपन 
वो माँ की गोट की ठंडक, वो अपनों से भरा आंगन 
मगर अब तो न वो ठंडक, न वो आँगन, न है बचपन 
बस अब तो काटने को दोड़ता है ये अकेलापन 

ये तन्हाई, ये ख़ामोशी, ये सन्नाटा सताता है
ज़माना अपनी आज़ादी का हमको याद आता है

हमें भी काश राहों में वो सच्चे दोस्त मिल जाते 
जो जीवन के नफे नुकसान हर पहलु से समझाते 
तो शायद रास्तें में गिरने से पहले संभल जाते 
अमन के शहर में सच्चाई के परचम को लहराते 

हमारा दिल अब उस अंजान साथी को बुलाता है
ज़माना अपनी आज़ादी का हमको याद आता है

हमारा दिल तड़प कर शर्म से अब खूब रोता है 
ये अपने सर पे खुद अपनी खता का बोझ ढ़ोता है
इसे इस क़ैद में इस बात का अहसास होता है
वही तो काटता है फसल, जो इन्सान बोता है 

अब अपनी ही खताएँ सोच कर दिल काँप जाता है 
ज़माना अपनी आज़ादी का हमको याद आता है

by habib kavishi 

Thursday, 23 August 2012

नज़रों से तेरी जाम पिए जा रहा हूँ मैं

ग़ज़ल
नज़रों से तेरी जाम पिए जा रहा हूँ मैं 
और अल्विदाए होश किये जा रहा हूँ मैं 
बे खौफ जिन्दगी को जिए जा रहा हूँ मैं 
बस नाम तेरा नाम लिए जा रहा हूँ मैं

बरसा रहा है तीरे नज़र दिल पे वो मेरे 
और मुस्करा के दाद दिए जा रहा हूँ मैं 

सूई में तेरे ज़िक्र का धागा पिरो के बस 
अपनी जुबान-होंट सीए जा रहा हूँ मैं

कहतें हैं लोग इश्क है  इक जाम ज़हर का 
पर चाशनी समझ के पिए जा रहा हूँ मैं 

सूरत में मेरी यार की सूरत है जलवा गर 
अपनी बालाएं खुद ही लिए जा रहा हूँ मैं 

ये दर्दे इश्क दिल में सलामत रहे हबीब 
इस दर्द के सहारे जिए जा रहा हूँ मैं

گزل 

نظروں سے تیری جام پئے جا رہا ہوں میں 
اور آلودہ ہوش کئے جا رہا ہوں میں 

بے خوف زندگی کو جئےجا رہا ہوں میں 
بس نام تیرا نام لئے جا رہا ہوں میں 

برسا رہا ہے تیر نظر دل پہ وہ  میرے 
اور مسکرا کے داد دئے جا رہا ہوں میں

سوئی میں تیرے ذکر کا دھاگا پرو کے بس 
اپنی زبان ہونٹ سئے جا رہا ہوں میں

 کہتے ہیں لوگ عشق ہےاک جم زہر کا 
پر چاشنی سمجھ کے پئے جا رہا ہوں میں

صورت میں میری یار کی صورت ہے جلوہ گر 
اپنی بلاۓ خود ہی لئے جا رہا ہوں میں

یہ درد عشق دل میں سلامت رہے حبیب 
اس درد کے سہارے جئے جا رہا ہوں میں


Ghazal

Nazron se teri jaam piye ja raha hun mein 
Our alvida e hosh kiye ja raha hun mein 

Be khoof zindgi ko jiye ja raha hun mein 
Bas nam tera nam liye ja raha hun mein

Barsa raha hai teer e nazar dil pe wo mere
Our muskura ke dad diye ja raha hun mein

Sui mein tere zikr ka dhaga piro ke bas 
Apni zuban hont siye ja raha hun mein

Kehte hain loog ishq hai ek jaam zehr ka 
Par chashni samajh se piye ja raha hun mein

Surat mein meri yaar ki surat hai jalwa gar 
Apni balaa e khud hi liye ja raha hun mein 

Ye dard e ishq dil mein salamat rahe habib
Is dard ke sahare jiye ja raha hun mein 

by habib kavishi 

Monday, 20 August 2012

मेरी गाफिल तबियत को मकामे होश दे साकी

मेरी गाफिल तबियत को मकामे होश दे साकी.
में आऊ होश में जिस से वो जामे होश दे साकी.

                                                ज़माने के फरेबों का नशा सर से उतर जाए.
                                                तेरे जलवे वहीँ देखूं नज़र मेरी जिधर जाए .

मुझे अपनी नज़र से वो पयामे होश दे साकी.
में आऊ होश में जिस से वो जामे होश दे साकी.

                                                जो तेरे मैकदे नेमते उज़मा अता की है.
                                                मेरे जैसे बहकते पर इनायत बरमला की है.

उसी नेमत के सदके अह्तरामे होश दे साकी.
में आऊ होश में जिस से वो जामे होश दे साकी.