Monday, 10 September 2012

ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती (रह.) की ग़ज़ल


 Ghazal In Persion (Farsi) And Translation in Urdu and Hindi 

(1) Persion
 توئی کہ جز توُ ترا خود حجاب دیگر نیست
بغیر نور رخت را نقاب دیگر نیست
(1) Urdu
تو ہے کہ تیرے سوا دوسرا حجاب نہیں
سوائے نور کے تیرے کوئی نقاب نہیں
(1) Hindi
तू है कि तेरे सिवा दूसरा कोई हिजाब नहीं है 
सिवाय नूर के तेरे कोई तेरा नक़ाब नहीं है 
(2) Persion
توئی معّرفِ خود لا جرم بدہی گشت
کہ در تصور تو اکتساب دیگر نیست
(2) Urdu
فقط توہی ہے کہ واقف ہے ذات سے اپنی
تیرے خیال میں غیروں کا اکتساب نہیں
 (2) Hindi 
फ़कत तू ही है वाकिफ़ ज़ात से अपनी
तेरे ख्याल  में गैरों का इक्तसाब नहीं है
(3) Persion
رموز عشق ز لوح دلم مطالعہ کن
کہ حلِّ نکنۂ عشق از کتاب دیگر نیست
(3) Urdu
رموز عشق کو پڑھ دل کی لوح پر اپنی
کہ اس کے نکتہ کے حل کی کوئی کتاب نہیں
 (3) Hindi
रमूज़-ए-इश्क को पढ़ दिल की लोह पर अपनी
कि इसके नुक्ते के हल की कोई किताब नहीं है 
(4) Persion
شہود حق طلبی از وجود خود بگذر
کہ زجز وجود تو او را حجاب دیگر نیست
(4) Urdu
گذر وجود سے اپنے جو ہو خدا طلبی
سوا وجود کے تیرے کوئی حجاب نہیں
(4) Hindi
गुज़र वजूद से अपने, जो हो खुदा तालिब 
सिवा वजूद के तेरे, कोई हिजाब नहीं
(5) Persion
ز قصر تن بگذر ،در لباب جاں بنگر
درا ں لباب عجب گر کتاب دیگر نیست
(5) Urdu
گذر کے جلد بدن سے تو مغز جان کو دیکھ
کہ لوح جاں کے علاوہ کوئی کتاب نہیں


(5) Hindi
गुज़र के जल्द बदन कर तू महज़ जान को देख 
के तेरी जान के अलावा कोई किताब नहीं
(6) Persion
بمرد زاہد ما، در خمار خمر بہشت
گماں کہ برد جزآں مے شراب دیگر نیست
(6) Urdu
خمار بادۂ جنت میں مر گیا زاہد
گماں اُسے تھا کہ اس کے سوا شراب نہیں


(6) Hindi
खुमार-ए-बादाह-ए-जन्नत में मर गया जाहिद
गुमाँ उसे था के उसके सिवा शराब नहीं है
(7) Persion
چو محو تست معیں نام او چہ می پرسی
کہ جز خموشی اش اکنوں جواب دیگر نیست
(7) Urdu
جب اس میں محو ہے تو اے معین نام نہ پوچھ
سوا سکوت کے اِس دم کوئی جواب نہیں 
(7) Hindi
जब उसमें खो गया तो ऐ मोईन नाम न पूछ
सिवा सकूत के इस दम कोई जवाब नहीं


शब्दों का अर्थ:
हिजाब =पर्दा
फ़कत = बस
वाकिफ़ = परिचित
इक्तसाब = ज़िक्र
रमूज़ = रहस्य
वजूद = बदन, शख्सियत
खुमार-ए-बादाह-ए-जन्नत = जन्नत की शराब का सुरुर
जाहिद = शेख
सकूत = ख़ामोशी


Translated By Habib Kavishi 

12 comments:

  1. बेहद खूबसूरत और माय्नेखेज़ अशआर... बेहतरीन गज़ल...

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  2. भाई हबीब काविशी साहब! आपके ब्लॉग का कॉन्सेप्ट अच्छा लगा. फारसी स्क्रिप्ट की मेरी जानकारी कम है. इसलिए ये नहीं समझ सका कि इस ग़ज़ल का फारसी स्वरूप क्या है. जिस तरह इसके उर्दू तर्जुमा को आपने देवनागरी में पेश किया उसी तरह मूल फारसी को भी देवनागरी में दे देते तो हमारा फारसी का कुछ ज्ञान बढ़ता और उसके तर्जुमा का और आनंद आता.

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    1. शुक्रिया गौतम जी,

      मैं कोशीश करूँगा फारसी को देवनागरी में लिखने की,

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  3. हबीब काविशी साहब बेहतरीन नज्म पढवाई इतनी अदबी उर्दू (फ़ारसी )में .शुक्रिया ज़नाब का .
    ram ram bhai

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  4. बहुत बढ़िया उम्दा प्रस्तुति

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  5. लाजवाब हैं सभी शेर .... बहुत उम्दा ...

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  6. सूफी सन्तों से धनी, अपना प्यारा देश।
    सन्तों से निखरा हुआ, भारत का परिवेश।।

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  7. इतनी उम्दा शायरी पढवाने का धन्यवाद ।

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  8. प्रिय ख्वाजा जी की गजल
    इबाबत है हमारे लिए
    हर शेर पर सजदा है हमारा

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  9. शुक्रिया आप सब लोगों का

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  10. शुक्रिया हबीब भाई।

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