Tuesday, 4 September 2012

नज़्म: कैदी की फरयाद



कोई पंछी खुले आकाश में जब गीत गाता है
ज़माना अपनी आज़ादी का हमको याद आता है

कभी बाहर के मन चाहे नज़ारे देखते थे हम 
कभी लहरों को दरया के किनारे देखते थे हम
कभी बागों में खिलते फूल सारे देखते थे हम
कभी अपनी छतों से चाँद तारे देखते थे हम

ये पंछी आज हम को याद वो यादे दिलाता है
ज़माना अपनी आज़ादी का हमको याद आता है

कभी हम ईद के दिन सब गले मिलते-मिलाते थे
कभी दीपावली के दिन दिए घर में जलाते थे 
कभी पच्चीस दिसंबर को क्रिसमस डे मानते थे 
कभी प्रकाश उत्सव पर गुरुद्वारे सजाते थे 

हर इक बीता हुआ त्यौहार जब सपनों में आता है 
ज़माना अपनी आज़ादी का हमको याद आता है

हमें अब याद आता है वो हँसता खेलता बचपन 
वो माँ की गोट की ठंडक, वो अपनों से भरा आंगन 
मगर अब तो न वो ठंडक, न वो आँगन, न है बचपन 
बस अब तो काटने को दोड़ता है ये अकेलापन 

ये तन्हाई, ये ख़ामोशी, ये सन्नाटा सताता है
ज़माना अपनी आज़ादी का हमको याद आता है

हमें भी काश राहों में वो सच्चे दोस्त मिल जाते 
जो जीवन के नफे नुकसान हर पहलु से समझाते 
तो शायद रास्तें में गिरने से पहले संभल जाते 
अमन के शहर में सच्चाई के परचम को लहराते 

हमारा दिल अब उस अंजान साथी को बुलाता है
ज़माना अपनी आज़ादी का हमको याद आता है

हमारा दिल तड़प कर शर्म से अब खूब रोता है 
ये अपने सर पे खुद अपनी खता का बोझ ढ़ोता है
इसे इस क़ैद में इस बात का अहसास होता है
वही तो काटता है फसल, जो इन्सान बोता है 

अब अपनी ही खताएँ सोच कर दिल काँप जाता है 
ज़माना अपनी आज़ादी का हमको याद आता है

by habib kavishi 

1 comment:

  1. बहुत ही खूबसूरती के साथ लिखा है हबीब भाई... ज़बरदस्त....

    ब्लॉग जगत में आपका खैर-मकदम करता हूँ...

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